स्वामी विवेकानंद-जी

स्वामी विवेकानंद

भारतीय संस्कृति को विश्व के पटल पर पहचान दिलाने वाले महापुरुष स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। इनकी माता जी का नाम श्रीमती भुवनेश्वरी देवी और पिता जी का नाम विश्वनाथ दत्त था। ऐसी महान विभूति ने जन्म से भारत माता का सर ऊंचा हो गया।

 

विवेकानंद जी अपने पितामह स्वर्गीय दुर्गादास से मिलते थे और परिवार के लोगों ने पितामह से मिलने के कारण बालक का नाम दुर्गादास रखने की इच्छा जाहिर की लेकिन उनकी माता जी एक स्वप्न देखा था जिसके आधार पर उस बालक का नाम वीरेश्वर रख दिया गया। घर के सारे लोग उसे प्रेम से 'बिले" कहकर बुलाने लगे थे। हिन्दू परंपरा के अनुसार किसी व्यक्ति के दो नाम होते हैं एक नाम कहने का होता है और दूसरा नाम राशि का होता है।अन्नप्रास के दिन पर बालक का शुभ नाम नरेंद्र रख दिया गया।

 

नरेंद्र की बुद्धि बचपन से ही बहुत तेज थी, वे बचपन मे बहुत शरारती थे। कोई भी उन्हे कितना भी डांटे लेकिन उनपर इसका कोई असर नहीं पड़ता था वे किसी के डराने से नहीं डरते थे। उनकी माता भुवनेश्वरी ने बालक को डराने के लिए एक युक्ति सोची और जब वें अधिक शरारत करते तो उनकी माता उनपर शिव-शिव कहकर पानी को डाल देती थी। जिससे बालक नरेंद्र बिल्कुल शांत हो जाते थे। माता जी के द्वारा उन्हे रामायण और महाभारत की कहानी सुनना बहुत अधिक प्रिय लगता था और उन्हे गाड़ी में घूमने का बहुत शौक था, जब भी कोई उनसे पूछता तो कहते की मैं बड़ा होकर कोचवान बनूँगा। 

 

पश्चिमी सभ्यता मे भरोसा रखने वाले उनके पिता विश्वनाथ जी अपने पुत्र को अंग्रेजी की शिक्षा देकर उनको पश्चिमी सभ्यता में ढालना चाहते थे। विवेकानंद जी ने भारतीय संस्कृती को विश्व के पटल पर सम्मान दिलाने का श्रेय विवेकानंद जी को जाता है। व्यायाम, कुश्ती, क्रिकेट आदि खेलने में विवेकानंद जी की बहुत रुचि थी। वें कभी-कभी अपने मित्रों के साथ हसी मजाक भी कर लेते थे।

 

जनरल असेम्बली कॉलेज के अध्यक्ष विलयम हेस्टी का कहना था कि –नरेन्द्रनाथ दर्शन शास्त्र के अतिउत्तम छात्र हैं। इंग्लैंड और जर्मनी के सारे विश्व विद्यालयों में नरेंद्र जैसा मेधावी छात्र कोई और दूसरा नहीं था। नरेंद्र अपने चरित्र में जो भी महान थे उसके पीछे उनकी माता जी की शिक्षा का योगदान है। 


वें बचपन से हो परमात्मा को प्राप्त करना चाहते थे। डेकार्ट का अंहवाद, डार्विन का विकासवाद, स्पेंसर के अद्वेतवाद को सुनकर नरेन्द्रनाथ सत्य को पाने का लिये व्याकुल हो उठते थे। वें इसी लक्ष्य को पूरा करने के उद्देश्य से ही वे ब्रह्मसमाज गए लेकिन वहाँ पर भी उनका मन शांत नहीं हुआ, रामकृष्ण परमहंस कर बारे में सुनकर वें उनके पास गए और उनके विचारों से प्रभावित होकर उन्हे अपना गुरु स्वीकार कर लिया। परमहंस के प्रयत्न से उनका आत्म साक्षात्कार हुआ। नरेंद्र परमहंस के सभी शिष्यों मे सबसे होनहार थे। 25 वर्ष के आयु में वे गेरुआ वस्त्र को धारण करके सन्यासी बन गए और विश्व भ्रमण पर निकल गए। 

 

1893 में वे  शिकागो में भारत के प्रतिनिधि बनकर वहाँ पर गए लेकिन उस समय यूरोप मे भारतीयों को बड़ी हीन भावना से देखा जाता था। एक प्रोफेसर के कठिन प्रयास स्वामी जी बोलने का अवसर प्राप्त हुआ। 


विवेकानंद जी ने अपने भाषण की शुरुआत  (“Sisters and Brothers of America“) बहनों और भाइयों कहकर वहाँ के सभी श्रोताओं को संबोधित किया स्वामी जी के मुख मण्डल से ये शब्द सभी लोगों से सुना तो उनका स्वागत तालियों के साथ हुआ। श्रोता उनके शब्दों को इतने ध्यान से सुन रहे थे की बोलने की सीमा कब समाप्त हो गई  उन्हे पता ही नहीं चला । अध्यक्ष गिबन्स के अनुरोध करने पर स्वामी जी ने अपने भाषण को 20मिनट से अधिक समय तक जारी रखा। उनसे प्रेरित होकर हजारों लोग उनके शिष्य बन गए। जब भी कोई शोर होता था तो स्वामी जी के भाषण सुनने का प्रलोभन देकर शोर को शांत कराया जाता था। 

 

स्वामी जी अपने भाषण ये साबित कर दिया की हिन्दू धर्म भी महान है और हिन्दू धर्म में सभी धर्मों को जोड़ने के क्षमता है, स्वामी जी ने इतनी दूर भारतीय संस्कृति का मान बढ़ा कर भारत के मस्तक को गर्व से ऊंचा कर दिया। 


स्वामी जी ना केवल संत  नहीं बल्कि वे देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानवप्रेमी भी थे।  1899 मे कोलकाता में फैले हुए भीषण प्लेग में भी वें तन और मन से महामारी से पीड़ित लोगों की मदद करके इंसानियत की एक मिसाल पेश की। स्वामी विवेकानंद जी ने 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, रामकृष्ण मिशन, दूसरों की सेवा और परोपकार को कर्मयोग मानता है जो कि हिन्दुत्व में प्रतिष्ठित एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

 

 39 वर्ष के छोटे से जीवन में स्वामी जी ने बहुत महान कार्य किए जो आने वाली पीढ़ियों मार्गदर्शन करते रहेंगे। 4 जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद जी इस संसार से हमेशा के लिए चले गया और ईश्वर मे विलीन हो गए। 

 

महत्त्वपूर्ण तिथियाँ
- 12 जनवरी,1863 : कलकत्ता में जन्म
- सन् 1879 : प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश
- सन् 1880 : जनरल असेंबली इंस्टीट्यूशन में प्रवेश
- नवंबर 1881 : श्रीरामकृष्ण से प्रथम भेंट
- सन् 1882-86 : श्रीरामकृष्ण से संबद्ध
- सन् 1884 : स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण; पिता का स्वर्गवास
- सन् 1885 : श्रीरामकृष्ण की अंतिम बीमारी
- 16 अगस्त, 1886 : श्रीरामकृष्ण का निधन
- सन् 1886 : वराह नगर मठ की स्थापना
- जनवरी 1887 : वराह नगर मठ में संन्यास की औपचारिक प्रतिज्ञा
- सन् 1890-93 : परिव्राजक के रूप में भारत-भ्रमण
- 25 दिसंबर, 1892 : कन्याकुमारी में
- 13 फरवरी, 1893 : प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान सिकंदराबाद में
- 31 मई, 1893 : बंबई से अमेरिका रवाना
- 25 जुलाई, 1893 : वैंकूवर, कनाडा पहुँचे
- 30 जुलाई, 1893 : शिकागो आगमन
- अगस्त 1893 : हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. जॉन राइट से भेंट
- 11 सितंबर, 1893 : विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान
- 27 सितंबर, 1893 : विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में अंतिम व्याख्यान
- 16 मई, 1894 : हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषण
- नवंबर 1894 : न्यूयॉर्क में वेदांत समिति की स्थापना
- जनवरी 1895 : न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरंभ
- अगस्त 1895 : पेरिस में
- अक्तूबर 1895 : लंदन में व्याख्यान
- 6 दिसंबर, 1895 : वापस न्यूयॉर्क
- 22-25 मार्च, 1896 : वापस लंदन
- मई-जुलाई 1896 : हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान
- 15 अप्रैल, 1896 : वापस लंदन
- मई-जुलाई 1896 : लंदन में धार्मिक कक्षाएँ
- 28 मई, 1896 : ऑक्सफोर्ड में मैक्समूलर से भेंट
- 30 दिसंबर, 1896 : नेपल्स से भारत की ओर रवाना
- 15 जनवरी, 1897 : कोलंबो, श्रीलंका आगमन
- 6-15 फरवरी, 1897 : मद्रास में
- 19 फरवरी, 1897 : कलकत्ता आगमन
- 1 मई, 1897 : रामकृष्ण मिशन की स्थापना
- मई-दिसंबर 1897 : उत्तर भारत की यात्रा
- जनवरी 1898: कलकत्ता वापसी
- 19 मार्च, 1899 : मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना
- 20 जून, 1899 : पश्चिमी देशों की दूसरी यात्रा
- 31 जुलाई, 1899 : न्यूयॉर्क आगमन
- 22 फरवरी, 1900 : सैन फ्रांसिस्को में वेदांत समिति की स्थापना
- जून 1900 : न्यूयॉर्क में अंतिम कक्षा
- 26 जुलाई, 1900 : यूरोप रवाना
- 24 अक्तूबर, 1900 : विएना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की यात्रा
- 26 नवंबर, 1900 : भारत रवाना
- 9 दिसंबर, 1900 : बेलूर मठ आगमन
- जनवरी 1901 : मायावती की यात्रा
- मार्च-मई 1901 : पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थयात्रा
- जनवरी-फरवरी 1902 : बोधगया और वारणसी की यात्रा
- मार्च 1902 : बेलूर मठ में वापसी
- 4 जुलाई, 1902 : महासमाधि।